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संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित | 200+ Sanskrit Shlokas With Meaning in Hindi

Author: Amresh Mishra | 2 weeks ago

Sanskrit Shlokas With Meaning in Hindi: हमारे देश में सभी भाषाओं का अपना अलग अलग महत्व माना जाता है। ऐसे में सभी भाषाओं में से एक भाषा संस्कृत भी शामिल है। जो कि काफी शुद्ध और पवित्र मानी जाती है। संस्कृत भाषा का इतना अधिक पवित्र Sanskrit ke slokas के वजह से माना जाता है। साथ ही आपको यह भी बता दूं कि संस्कृत भाषा सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है। हमारे देश में संस्कृत भाषा को देवी देवताओं के भाषाओं से तुलना की जाती है।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि पहले के समय में लोग Sanskrit Shlok के माध्यम से ही एक दूसरे से बात किया करते थे। तो क्या आप भी एक भारतीय हिंदू धर्म से ताल्लुक रखने वालों में से एक है, यदि हां तो आपको भी संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shlokas) का ज्ञान होना जरूरी होता है। जी हां एक हिंदी धर्म के व्यक्ति को संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shlokas) का थोड़ा भी ज्ञान न हो यह अच्छी बात नहीं होती है। 

क्योंकि सरल शब्दों में समझा जाए तो एक मनुष्य जाति के लिए संस्कृत हर किसी के जीवन का एक अहम भाग माना जा सकता है। साथ ही आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि पुराने समय में कई ऋषि मुनियों ने बेहतरीन बेहतरीन श्लोक संस्कृत भाषा में लिखा है। तो क्या आपको संस्कृत भाषा में श्लोक का थोड़ा बहुत भी ज्ञान नहीं है, यदि नहीं है, तो कोई बात नहीं तो आपको हमारे लेख के अंत तक बने रहने की आवश्यकता होगी। 

sanskrit shlok with hindi meanings

क्योंकि आज के लेख में मैं आप सभी को 200+ संस्कृत श्लोक अर्थ सहित (Sanskrit Shlok With Meaning in Hindi) जानकारी साझा करने वाला हूं। आज के लेख में आपको बहुत सारी संस्कृत श्लोक का ज्ञान प्राप्त होने वाला है और वो भी अर्थ के साथ। इसलिए आप सभी से दरख्वास है कि आप हमारे लेख को आधा अधूरा ना पढ़ें। बल्कि आप हमारे पोस्ट के अंत तक ध्यान पूर्वक पढ़ें। 

Contents show

शुभ प्रभात संस्कृत श्लोक एवं हिंदी अर्थ – Good Morning Sanskrit Shlokas

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। 

गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।। 

Sanskrit shlok 1

अर्थात् : ऊपर दिए गए श्लोक का अर्थ है कि गुरु ही ब्रह्मा का रूप है, गुरु ही विष्णु का रूप है और गुरु ही प्रभु शिव है। इसके साथ ही श्लोक में यह भी कहा है कि गुरु ही परब्रह्मा है और ऐसे गुरु को मेरा नमन।

ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे
कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत
आ नः श‍ृण्वन्नूतिभिः सीदसादनम् ॥ ॥

भावार्थ : हे यजमानों के स्वामी, कवियों के कवि, सबसे प्रसिद्ध, आध्यात्मिक ज्ञान के सर्वोच्च राजा, आध्यात्मिक ज्ञान के भगवान। हम आपको पुकारते हैं, कृपा करके हमारी बात सुनें और हमारे स्थान में निवास करें.

ओङ्कारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः ।
कामदं मोक्षदं चैव ओङ्काराय नमो नमः ॥ ॥

भावार्थ: योगी निरन्तर ओंकार का ध्यान करते हैं, जो बिन्दुओं से बना है। ओंकार को नमस्कार, जो सभी इच्छाओं और मुक्ति को प्रदान करता है। ॥

गजाननं भूतगणादिसेवितं
कपित्थजंबूफलसारभक्षितम् ।
उमासुतं शोकविनाशकारणं
नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥ ॥

भावार्थ : उन भगवान गणेश को नमस्कार है जिनके सिर हाथी है, जिनकी भूतों और अन्य लोगों द्वारा पूजा की जाती है, जो अपने पसंदीदा सेब और गुलाब खाते हैं, मैं उमा के पुत्र, भगवान विघ्नेश्वर के चरण कमलों को प्रणाम करता हूं, जो सभी दुखों का नाश करते हैं।

शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा। 
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते।। 

अर्थात् : उपर दिए गए श्लोक का अर्थ है कि मैं दिए के प्रकाश को नमन करता हूं जो स्वास्थ्य, समृद्धि और शुभता हमारे जीवन में लाता है, जो अनैतिक भावनाओं को खत्म करता है। इसका अर्थ यह भी है कि मैं ऐसे प्रकाश को बार बार प्रणाम करता हूं। 

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन:॥  

ऊपर दिए गए श्लोक का अर्थ यह हुआ कि हर किसी को हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए, सत्य लेकिन अप्रिय नही बोलना चाहिए। प्रिय बोलिए लेकिन असत्य नहीं यही सनातन धर्म माना जाता है। 

गुणेष्वेव हि कर्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा।
गुण्युक्तो दरिद्रो अपि नेश्वरैरगुणेः समः।। 

इस श्लोक का अर्थ कुछ इस प्रकार है कि इंसानों को ज्ञान हासिल करने की कोशिश हमेशा करते रहना चाहिए। क्योंकि निर्धन होते हुए भी गुणवान होना अच्छी बात होती है। इसके विपरित देखा जाए तो जो धनवान गुणों से रहित है उन्हें सही नहीं माना जाता है। इसके साथ ही इस श्लोक में यह भी कहा गया है कि विश्व में यदि लोगो सेभाने सम्मान हासिल करना है, तो गुण प्राप्त होना अति आवश्यक है। 

न ही कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।
अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्॥ 

ऊपर दिए गए श्लोक का अर्थ है कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला है ये किसी को नहीं पता है। इसलिए हर किसी को अपना कार्य आज ही कर लेना चाहिए। यही बुद्धिमान व्यक्तियों की पहचान होती है। 

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

भावार्थ: उन्होंने सफेद कपड़े पहने हैं और उनकी चार भुजाएँ हैं, जो चंद्रमा के रंग की हैं। सभी बाधाओं को दूर करने के लिए व्यक्ति को भगवान के प्रसन्न मुख का ध्यान करना चाहिए।

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण, लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना, छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्॥ 

ऊपर दी गई श्लोक का अर्थ यह है कि दुर्जन की दोस्ती पहले तो काफी अच्छी होती है और क्रमशः कम होने वाली भी होती हैं। सज्जन लोगों की दोस्ती शुरुआत में कम और कुछ समय बाद में बढ़ने वाली होती है। इस तरह से देखा जाए तो दिन के पूर्वार्ध और परार्ध में अलग-अलग दिखने वाली छाया की तरह ही दुर्जन और सज्जन लोगों की दोस्ती होती है। 

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति।।

ऊपर दिए गए श्लोक का अर्थ है कि जिस तरह से एक चक्के के जरिए रथ नहीं चल सकता ठीक उसी प्रकार बगैर पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकते है। 

स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्।
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते।। 

ऊपर दिए गए श्लोक का अर्थ होता है कि जन्म और मृत्यु तो संसार का एक ऐसा नियम माना जाता है जिसे कोई भी नहीं रोक सकता है। यह चक्र की तरह चलता ही रहता हैं। परंतु जन्म लेना उसी के लिए सार्थक होता है जिसके जन्म से कुल ks विकाश हो। 

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।
काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।। 

ऊपर दिए गए श्लोक के अनुसार, दुष्ट प्रवृत्ति वाले लोग जब तक दूसरों की निंदा नहीं करते है तब तक उन्हें आनंद नहीं आता है। जैसे कि कौवा जो सब रसों का तो भोग करता ही है लेकिन भाग करने के बाद भी वे गंदगी किए बगैर रह नहीं सकते। 

विवादो धनसम्बन्धो याचनं चातिभाषणम् ।
आदानमग्रतः स्थानं मैत्रीभङ्गस्य हेतवः॥ 

ऊपर दिए गए श्लोक का अर्थ है कि वाद-विवाद, माँगना, धन के लिये सम्बन्ध बनाना, ऋण लेना, अधिक बोलना, आगे निकलने की चाह रखना – यह सब दोस्ती के टूटने की वजह बनती हैं इसलिए हमेशा व्यक्ति को उनसे दूरी बना कर रखने की ही आवश्यकता होती है। 

जीवन पर संस्कृत श्लोक एवं हिंदी अर्थ – Sanskrit Shlokas on Life

जीवेषु करुणा चापि मैत्री तेषु विधीयताम् ।

इस श्लोक का अर्थ है कि जीवो पर व्यक्तियों को हमेशा करुणा और दया की भावना बनाए रखने की आवश्यकता होती है और उनसे दोस्ती पूर्वक व्यवहार करना हर व्यक्ति को चाहिए। 

जीवेषु करुणा चापि मैत्री तेषु विधीयताम् । 

ऊपर दिए गए श्लोक के अनुसार किसी भी जीव पर हमेशा दया और करुणा की भावना बनाए रखने की आवश्यकता होगी। आपको हमेशा उनके साथ मित्रता पूर्वक व्यवहार बनाए रखने की जरूरत होगी। 

आढ् यतो वापि दरिद्रो वा दुःखित सुखितोऽपिवा ।
निर्दोषश्च सदोषश्च व्यस्यः परमा गतिः ॥ 

इस श्लोक का अर्थ चाहे धनी हो या निर्धन, दुःखी हो या सुखी, निर्दोष हो या सदोष – दोस्त ही किसी व्यक्ति का सच्चा सहारा बन सकता है। 

यः पठति लिखति पश्यति, परिपृच्छति पंडितान् उपाश्रयति।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनी, दलं इव विस्तारिता बुद्धिः॥

जो लोग पढ़ते है, लिखते है, देखते है, सवाल पूछते है और बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती जा रही है जैसे कि सूर्य किरणों से कमल की पंखुड़ियाँ बढ़ती है।

स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्।
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते।। 

जन्म और मृत्यु विश्व का नियम है यह चक्र चलता रहता है लेकिन जन्म लेना उसी का सार्थक है जिसके जन्म से कुल का विकास होता हो। 

आयुषः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न न लभ्यते।
नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ॥ 

सभी कीमती रत्नों से कीमती एक जीवन होता है जिसका एक क्षण भी वापस नहीं पाया जा सकता है। इसलिए इसे फालतू के कामों में खर्च करना बहुत बड़ी गलती है। 

ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।
भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्।। 

लेना, देना, खाना, खिलाना, रहस्य बताना और उन्हें सुनना ये सभी 6 प्रेम के सिम्टम होते है। 

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वान्हे चापरान्हिकम्।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम्।।

जिस कार्य को कल करना है उसे आज और जो कार्य शाम के वक्त करना हो तो उसे सुबह के वक्त ही पूर्ण कर लेना चाहिए। क्योंकि मौत कभी यह नहीं देखती कि इसका कार्य अभी भी बाकी है। 

अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद् गजभूषणं।
चातुर्यम् भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणं।।

ऊपर दिए गए श्लोक का अर्थ यह है कि घोड़े की शोभा उसके वेग से होती है और हाथी की शोभा उसकी मदमस्त चाल से होती है। नारियों की शोभा उनकी विभिन्न कामों में दक्षता के कारण और पुरुषों की उनकी उद्योगशीलता की वजह होती है। 

परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः।
अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम्।। 

यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी मदद करें तो उसको अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दें और अपने परिवार का सदस्य ही आपको नुकसान देना शुरू हो जाये तो उसे महत्व देना बंद कर दें। ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमार हो जाये तो वह हमें तकलीफ पहुंचती है। जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है। 

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कंकणेन।
विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्न तु चन्दनेन।।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि कानों में कुंडल पहन लेने से चेहरे की शोभा नहीं बढ़ती, लेकिन वही पर अगर ज्ञान की बातें सुनते है तो उससे शोभा बढ़ती है। हाथों की सुन्दरता कंगन पहनने से नहीं होती बल्कि दान देने से होती है। सज्जनों का शरीर भी चन्दन से नहीं बल्कि परहित में किये गये कार्यों से शोभायमान होता है।

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वान्हे चापरान्हिकम्।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम्।।

जिस कार्य को कल करना है उसे आज और जो कार्य को शाम के वक्त पर करना हो तो उसे भोर के वक्त ही पूर्ण कर लेना चाहिए। क्योंकि मृत्यु किसी को पुछ कर नहीं बल्कि कभी यह नहीं देख कर आती कि इसका काम अभी भी बचा हुआ है।

यस्तु संचरते देशान् यस्तु सेवेत पण्डितान्।
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि।।

जो लोग अलग अलग देशों में सफर करते है और विद्वानों से सम्बन्ध रखते है। उन लोगों  की बुध्दि उसी प्रकार होती है जैसे तेल की एक बूंद पूरे पानी में फिर जाती है।

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्।।

Sanskrit shlok 3

इसका अर्थ यह है कि विद्या हमें विनम्रता प्रदान करती है। विनम्रता से योग्यता प्राप्त होती है व योग्यता से हमें धन मिलता है और इस धन से हम धर्म के काम करते है और सुखी रहते है।

नीरक्षीरविवेके हंस आलस्यं त्वं एव तनुषे चेत।
विश्वस्मिन अधुना अन्य:कुलव्रतम पालयिष्यति क:।।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि ऐ हंस, यदि तुम दूध और पानी में अंतर करना छोड़ दोगे तो तुम्हारे कुलव्रत का पालन इस दुनिया मे कौन करेगा। अगर बुद्धिमान लोग ही इस दुनिया मे अपना कर्त्तव्य त्याग देंगे तो निष्पक्ष व्यवहार कौन करेगा। 

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्‌, मा स्वसारमुत स्वसा।
सम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।।

ऊपर दिए गए श्लोक का अर्थ है कि भाई अपने भाई से कभी द्वेष नहीं करें, बहन अपनी बहन से द्वेष नहीं करें, समान गति से एक दूसरे का आदर-सम्मान करते हुए परस्पर मिल-जुलकर कर्मों को करने वाले होकर अथवा एकमत से हर एक कामों को करने वाले होकर भद्रभाव से परिपूर्ण होकर संभाषण करें। 

प्रदोषे दीपक : चन्द्र:,प्रभाते दीपक:रवि:।
त्रैलोक्ये दीपक:धर्म:,सुपुत्र: कुलदीपक:।।

संध्या काल में चन्द्रमा दीपक है, प्रभात काल में सूर्य दीपक है, तीनों लोकों में धर्म दीपक है और सुपुत्र कूल का दीपक है। 

व्यसने वार्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवितान्तगते।
विमृशंश्च स्वया बुद्ध्या धृतिमान नावसीदति।।

शोक में, आर्थिक संकट में या प्राणों का संकट होने पर जो अपनी बुद्धि से विचार करते हुए धैर्य धारण करता है। उसे अधिक कष्ट नहीं उठाना पड़ता।

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमभ्येति नापरीक्ष्य च विश्वसेत्।।

जो विश्वसनीय नहीं है, उस पर कभी भी विश्वास न करें। परन्तु जो विश्वासपात्र है, उस पर भी आंख मूंदकर भरोसा न करें। क्योंकि अधिक विश्वास से भय उत्पन्न होता है। इसलिए बिना उचित परीक्षा लिए किसी पर भी विश्वास न करें।

मातृवत परदारांश्च परद्रव्याणि लोष्टवत्।
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स पश्यति।।

पराई स्त्री को माता के समान, परद्रव्य को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान देखता है। वास्तव में उसी का देखना सफल है।

कर्म पर संस्कृत श्लोक – Sanskrit Shlokas on Karma

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।।

प्रिय वचन बोलने से सभी जीव प्रसन्न हो जाते हैं। मधुर वचन बोलने से पराया भी अपना हो जाता है। अतः प्रिय वचन बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमभ्येति नापरीक्ष्य च विश्वसेत्।।

जो विश्वसनीय नहीं है, उस पर कभी भी विश्वास न करें। परन्तु जो विश्वासपात्र है, उस पर भी आंख मूंदकर भरोसा न करें। क्योंकि अधिक विश्वास से भय उत्पन्न होता है। इसलिए बिना उचित परीक्षा लिए किसी पर भी विश्वास न करें।

कवचिद् रुष्टः क्वचित्तुष्टो रुष्टस्तचष्टः क्षणे क्षणे।
अव्यवस्थितचित्तस्य प्रसादो अपि भयंकरः।।

जो कभी नाराज होता है, कभी प्रसन्न होता है। इस प्रकार क्षण क्षण में नाराज और प्रसन्न होता रहता है। उस चंचल चित्त पुरुष की प्रसन्नता भी भयंकर है।

जिव्हा दग्धा परान्नेन करौ दग्धौ प्रतिगृहात्।
मनो दग्धं परस्त्रीभिः कार्यसिद्धिः कथं भवेत्।।

दूसरे का अन्न खाने से जिसकी जीभ जल चुकी है। दूसरे का दान लेने से जिसके हाथ जल चुके हैं। दूसरे की स्त्री का चिंतन करने से जिसका मन जक चुका है। उसे पूजा पाठ जप तप से सिद्धि कैसे मिल सकती है।

विभवे भोजने दाने तिष्ठन्ति प्रियवादिनः।
विपत्ते चागते अन्यत्र दृश्यन्ते खलु साधवः।।

मनुष्य के सुख- समृद्धि के समय, खान- पान और मान के समय चिकनी चुपड़ी बातें करने वालों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन विपत्ति के समय केवल सज्जन पुरुष ही साथ दिखाई पड़ते हैं।

न विज्ञातं न चागम्यं नाप्राप्यं दिवि चेह वा।
उद्यतानां मनुष्याणां यतचित्तेन्द्रियात्मनाम्।।

विद्वान पुरुषों के लिए कौन सा कार्य असाध्य है। जो अपने मन, बुद्धि और इंद्रियों को संयमित रखकर उद्यम में लगे रहते हैं। उनके लिए पृथ्वी, आकाश और पाताल में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं जो अगम्य, अप्राप्य अथवा अज्ञात हो।

मनसि वचसि काये पुण्यपीयुषपूर्णाः,
त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं,
निजह्रदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः।

जिनके मन, वचन और शरीर पुन्यरूपी अमृत से भरे हैं। जो अपने उपकारों से तीनों लोकों को तृप्त करते हैं। जो दूसरों के परमाणु जितने छोटे गुणों को भी पर्वत के समान बड़े समझकर अपने हृदय में धारण करते हैं। ऐसे सज्जन संसार में कितने हैं ? 

या कुन्देन्दु तुषारहार धवला, या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमंडित करा, या श्वेतपद्मासनाः।।
या बम्हाच्युतशंकर प्रभृतिभिः देवैः सदा वन्दितः।
सा माम् पातु भगवती सरस्वती, निःशेषजाड्यापहा।।

जो देवी शारदा कुंद के फूल, बर्फ के हार और चन्द्रमा के समान श्वेत और श्वेत वस्त्रों से सुशोभित हैं। जिनके हाथों में वीणा का दंड शोभित है। जो श्वेत कमल पर आसीन हैं और जिनकी स्तुति ब्रम्हा, विष्णु, महेश आदि देवता सदा ही किया करते हैं। वे भगवती सरस्वती अज्ञान के अंधकार से मेरी रक्षा करें।

यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यंचों अपि सहायताम्।
अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोपि विमुञ्चति।।

धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने वाली की संसार के सभी प्राणी सहायता करते हैं। जबकि अन्याय के मार्ग पर चलने वाले को उसका सगा भाई भी छोड़ देता है।

शरदि न वर्षति गर्जति,
वर्षति वर्षासु निःस्वनो मेघः।
नीचो वदति न कुरुते,
न वदति सुजनः करोत्येव।।

शरद ऋतु में बादल गरजता तो है लेकिन बरसता नहीं है। जबकि वर्षा ऋतु में वह गरजता नहीं है केवल बरसता है। इसी तरह बड़बोला आदमी कहता बहुत है किंतु करता कुछ नहीं। जबकि सज्जन कहता तो कुछ नहीं, किंतु करता अवश्य है।

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।।

प्रिय वचन बोलने से सभी जीव प्रसन्न हो जाते हैं। मधुर वचन बोलने से पराया भी अपना हो जाता है। अतः प्रिय वचन बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक एवं हिंदी अर्थ – Inspirational Sanskrit Shlokas

मूर्खो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे।
तयोः फलं तु तुल्यं हि भावग्राही जनार्दनः।।

मूर्ख कहता है विष्णाय नमः जोकि अशुद्ध है और ज्ञानी कहता है विष्णवे नमः जो व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है। लेकिन दोनों का फल एक ही है। क्योंकि भगवान शब्द नहीं भाव देखते हैं।

मातृवत परदारांश्च परद्रव्याणि लोष्टवत्।
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स पश्यति।।

पराई स्त्री को माता के समान, परद्रव्य को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान देखता है। वास्तव में उसी का देखना सफल है।

यत्र स्त्री यत्र कितवो बालो यत्रानुशासिता।
मज्जन्ति तेवशा राजन् नद्यामश्मप्लवा इव।।

जहां का शासन स्त्री, जुआरी और बालक के हाथ में होता है। वहां के लोग नदी में पत्थर की नाव में बैठने वालों की भांति विवश होकर विपत्ति के समुद्र में डूब जाते हैं।

लोके यशः परत्रापि फलमुत्तमदानतः।
भवतीति परिज्ञाय धनं दीनाय दीयताम्।।

दिए गए दान का फल इस लोक में यश और मृत्यु के बाद उत्तम लोकों की प्राप्ति है। इसलिए दीनों के निमित्त दान करना चाहिए।

शौर्य पर संस्कृत श्लोक और उसके हिंदी अर्थ

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

कोई भी काम कड़ी मेहनत के बिना पूरा नहीं किया जा सकता है सिर्फ सोचने भर से कार्य नहीं होते है, उनके लिए प्रयत्न भी करना पड़ता है। कभी भी सोते हुए शेर के मुंह में हिरण खुद नहीं आ जाता उसे शिकार करना पड़ता है।

अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात प्रतिनिवर्तते।
स दत्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति।।

अतिथि भगवान के समान होता है यदि किसी व्यक्ति के दरवाजे से अतिथि असंतुष्ट होकर चला जाता है तो वह उसके पुण्य ले जाता है और अपने पाप उसे देकर चला जाता है। 

लोके यशः परत्रापि फलमुत्तमदानतः।
भवतीति परिज्ञाय धनं दीनाय दीयताम्।।

किए गए दान का फल इस लोक में किस के रूप में प्राप्त होता है और मृत्यु के बाद उत्तम लोग की प्राप्ति होती है इसलिए दोनों को अपनी दिनचर्या में शामिल करके नियमित रूप से दान करना चाहिए।

यः पठति लिखति पश्यति, परिपृच्छति पंडितान् उपाश्रयति।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनी, दलं इव विस्तारिता बुद्धिः॥

Sanskrit shlok 2

जो मनुष्य पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है और बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है जैसे कि सूर्य किरणों से कमल की पंखुड़ियाँ बढ़ती है।

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।
काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।

दुष्ट प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों को दूसरों की निंदा किए बिना आनंद नहीं आता है जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है परंतु गंदगी भी जाए बिना उससे रहा नहीं जाता है।

शास्त्र पर संस्कृत श्लोक – Sanskrit Shlokas on Shastra

अनेकशास्त्रं बहुवेदितव्यम्, अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्ना:।
यत् सारभूतं तदुपासितव्यं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्भुमध्यात्॥

संसार में अनेक शास्त्र, वेद है, बहुत जानने को है लेकिन समय बहुत कम है और विद्या बहुत अधिक है। अतः जो सारभूत है उसका ही सेवन करना चाहिए जैसे हंस जल और दूध में से दूध को ग्रहण कर लेता है।

अष्टौ गुणा पुरुषं दीपयंति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च।
पराक्रमश्चबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥ 

ऊपर दिए गए आठ गुण मनुष्य को सुशोभित करते है – बुद्धि, अच्छा चरित्र, आत्म-संयम, शास्त्रों का अध्ययन, वीरता, कम बोलना, क्षमता और कृतज्ञता के अनुसार दान। 

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण, लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना, छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्॥ 

दुर्जन की मित्रता शुरुआत में बड़ी अच्छी होती है और क्रमशः कम होने वाली होती है। सज्जन व्यक्ति की मित्रता पहले कम और बाद में बढ़ने वाली होती है। इस प्रकार से दिन के पूर्वार्ध और परार्ध में अलग-अलग दिखने वाली छाया के जैसी दुर्जन और सज्जनों व्यक्तियों की मित्रता होती है।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

कोई भी काम कड़ी मेहनत के बिना पूरा नहीं किया जा सकता है सिर्फ सोचने भर से कार्य नहीं होते है, उनके लिए प्रयत्न भी करना पड़ता है। कभी भी सोते हुए शेर के मुंह में हिरण खुद नहीं आ जाता उसे शिकार करना पड़ता है। 

नास्ति मातृसमा छाय
नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं
नास्ति मातृसमा प्रपा॥

माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। माता के समान इस विश्व में कोई जीवनदाता नहीं॥

तावत्प्रीति भवेत् लोके यावद् दानं प्रदीयते ।
वत्स: क्षीरक्षयं दृष्ट्वा परित्यजति मातरम्

लोगों का प्रेम तभी तक रहता है जब तक उनको कुछ मिलता रहता है। मां का दूध सूख जाने के बाद बछड़ा तक उसका साथ छोड़ देता है।

आयुषः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न न लभ्यते।
नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ॥

सभी कीमती रत्नों से कीमती जीवन है जिसका एक क्षण भी वापस नहीं पाया जा सकता है। इसलिए इसे फालतू के कार्यों में खर्च करना बहुत बड़ी गलती है। 

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।

महाजनस्य संपर्क: कस्य न उन्नतिकारक:।
मद्मपत्रस्थितं तोयं धत्ते मुक्ताफलश्रियम्

महाजनों गुरुओं के संपर्क से किस की उन्नति नहीं होती। कमल के पत्ते पर पड़ी पानी की बूंद मोती की तरह चमकती है।

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं, श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत्।।

धर्म का सार तत्व यह है कि जो आप को बुरा लगता है वह काम आप दूसरों के लिए भी न करें। 

अहंकार पर संस्कृत श्लोक एवं हिंदी अर्थ – Sanskrit Shlokas on Ego

अन्यायोपार्जितं वित्तं दस वर्षाणि तिष्ठति।
प्राप्ते चैकादशेवर्षे समूलं तद् विनश्यति।।

अन्याय या गलत तरीके से कमाया हुआ धन दस वर्षों तक रहता है। लेकिन ग्यारहवें वर्ष वह मूलधन सहित नष्ट हो जाता है।

षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा तंद्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।

कल्याण की कामना रखने वाले पुरुष को निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता इन छ: दोषों का त्याग कर देना चाहिए।

सत्यं रूपं श्रुतं विद्या कौल्यं शीलं बलं धनम्।
शौर्यं च चित्रभाष्यं च दशेमे स्वर्गयोनयः।।

सत्य, विनय, शास्त्रज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शूरता और वाक्पटुता ये दस लक्षण स्वर्ग के कारण हैं।

षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा तंद्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।

कल्याण की कामना रखने वाले पुरुष को निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता इन छ: दोषों का त्याग कर देना चाहिए।

मातृवत परदारांश्च परद्रव्याणि लोष्टवत्।
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स पश्यति।।

पराई स्त्री को माता के समान, परद्रव्य को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान देखता है। वास्तव में उसी का देखना सफल है।

मूढ़ैः प्रकल्पितं दैवं तत परास्ते क्षयं गताः।
प्राज्ञास्तु पौरुषार्थेन पदमुत्तमतां गताः।।

भाग्य की कल्पना मूर्ख लोग ही करते हैं। बुद्धिमान लोग तो अपने पुरूषार्थ, कर्म और उद्द्यम के द्वारा उत्तम पद को प्राप्त कर लेते हैं।

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।।

प्रिय वचन बोलने से सभी जीव प्रसन्न हो जाते हैं। मधुर वचन बोलने से पराया भी अपना हो जाता है। अतः प्रिय वचन बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत।
यं तु रक्षितमिच्छन्ति बुद्धया संविभजन्ति तम्।।

देवतालोग चरवाहों की तरह डंडा लेकर पहरा नहीं देते। उन्हें जिसकी रक्षा करनी होती है। उसे वे सद्बुद्धि प्रदान कर देते हैं।

परस्वानां च हरणं परदाराभिमर्शनम्।
सचह्रदामतिशङ्का च त्रयो दोषाः क्षयावहाः।।

दूसरों के धन का अपहरण, पर स्त्री के साथ संसर्ग और अपने हितैषी मित्रों के प्रति घोर अविश्वास ये तीनों दोष जीवन का नाश करने वाले हैं।

धृतिः शमो दमः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा।
मित्राणाम् चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधः श्रियः।।

धैर्य, मन पर अंकुश, इन्द्रियसंयम, पवित्रता, दया, मधुर वाणी और मित्र से द्रोह न करना ये सात चीजें लक्ष्मी को बढ़ाने वाली हैं।

व्यसने वार्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवितान्तगते।
विमृशंश्च स्वया बुद्ध्या धृतिमान नावसीदति।।

शोक में, आर्थिक संकट में या प्राणों का संकट होने पर जो अपनी बुद्धि से विचार करते हुए धैर्य धारण करता है। उसे अधिक कष्ट नहीं उठाना पड़ता।

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमभ्येति नापरीक्ष्य च विश्वसेत्।।

जो विश्वसनीय नहीं है, उस पर कभी भी विश्वास न करें। परन्तु जो विश्वासपात्र है, उस पर भी आंख मूंदकर भरोसा न करें। क्योंकि अधिक विश्वास से भय उत्पन्न होता है। इसलिए बिना उचित परीक्षा लिए किसी पर भी विश्वास न करें।

कनिष्ठाः पुत्रवत् पाल्या भ्रात्रा ज्येष्ठेन निर्मलाः।
प्रगाथो निर्मलो भ्रातुः प्रागात् कण्वस्य पुत्रताम्।।

बड़े भाई को अपने छोटे भाइयों का पुत्रवत् पालन करना चाहिए। जैसे महर्षि कण्व ने अपने छोटे भाई प्रगाथ का पुत्रवत् पालन पोषण किया था।

न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत।
यं तु रक्षितमिच्छन्ति बुद्धया संविभजन्ति तम्।।

देवतालोग चरवाहों की तरह डंडा लेकर पहरा नहीं देते। उन्हें जिसकी रक्षा करनी होती है। उसे वे सद्बुद्धि प्रदान कर देते हैं।

नमस्ते शारदे देवी काश्मीरपुरवासिनि
त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे !!

आपको नमस्कार माँ शारदा

( माँ सरस्वती ), हे देवी, हे कश्मीर

में रहने वाली में आपके सामने

प्रतिदिन प्रार्थना करता हूं,

कृपया करके मुझे ज्ञान का दान दें!

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता ना भवति।

बेटा-बेटी (पुत्र-पुत्री) कुपुत्र हो सकते हैं, किन्तु माता कुमाता नहीं हो सकती वो तो ममता की मूरत होती है!

आचार्यात्पादमादत्ते पादं शिष्यः स्वमेधया
कालेन पादमादत्ते पादं सब्रह्मचारिभिः !!

शिष्य अपने जीवन का एक

भाग अपने आचार्य से सीखता है ,

एक भाग अपनी बुद्धि से सीखता है

एक भाग समय से सीखता है तथा एक भाग वह अपने सहपाठियों से सीखता है!

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय
लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं
नागाननाथ श्रुतियज्ञविभूषिताय
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते !!

विघ्नेश्वर, वर देनेवाले, देवताओं के प्रिय, लम्बोदर, कलाओं से परिपूर्ण, जगत् का हित करनेवाले, गज के समान मुखवाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है, हे गणनाथ ! आपको नमस्कार है!

आलस्य कुतो विद्या अविध्स्य कुतों धनम
अधनस्य कुतो मित्रम अमित्रस्य कूट: सुखम !!

आलसी व्यक्ति के लिए ज्ञान कहाँ हैं,

अज्ञानी मुर्ख के लिए धन (पैसा) कहाँ हैं, गरीब के लिए मित्र (दोस् ) कहाँ होते हैं और दोस्तों के बिना कोई कैसे खुश रह सकता हैं!

जरा रूपं हरति, धैर्यमाशा,
मॄत्यु: धर्मचर्यामसूया !!

वृद्धावस्था एक ऐसी अवस्था होती है

जिसमे पहुँचने के बाद वह सभी मनुष्य की सुंदरता, धैर्य आशा (इच्छा) मृत्यु, धर्म का आचरण, सुख–दुःख, काम, अभिमान, पद-प्रतिष्ठा सब को हर (छीन, नाश) लेती है!

विद्या पर संस्कृत श्लोक एवं हिंदी अर्थ | Sanskrit Shlok on Knowledge

सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम्
अहार्यत्वादनर्ध्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा !!

सब द्रव्यों में विद्यारुपी द्रव्य सर्वोत्तम है, क्योंकि वह किसी से हारा नहीं जा सकता उसका मूल्य नहीं हो सकता और उसका कभी नाश नहीं होता। 

आदि देव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर:
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते !!

हे आदिदेव सूर्य (भास्कर)

आपको मेरा प्रणाम, हे दिवाकर

आप मुझ पर प्रसन्न हो, हे दिवाकर

आपको मेरा नमस्कार है,

हे प्रभाकर आपको मेरा नमस्कार है!

निवर्तयत्यन्यजनं प्ररमादतः
स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते
गुणाति तत्त्वं हितमिछुरंगिनाम्
शिवार्थिनां यः स गुरु निर्गघते !!

जो दूसरों को प्रमाद (नशा, गलत काम ) करने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते पर चलते हैं, हित और कल्याण की कामना रखनेवाले को तत्त्वबोध (यथार्थ ज्ञान का बोध) कराते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं!

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा !!

जिनका एक दन्त टुटा हुआ है जिनका शरीर हाथी जैसा विशालकाय है और तेज सूर्य की किरणों की तरह है बलशाली है। उनसे मेरी प्रार्थना है मेरे कार्यों के मध्य आने वाली बाधाओं को सर्वदा दूर करें !

कण्ठे सर्प धारणा मस्तके चंद्र सुशोभितं
व्याघ्रस्य चर्म धारणं शिव शंकर त्रिलोचनं !!

गले में जिसने सर्प धारण किया है, मस्तक पर चंद्रमा सजा हुआ है और जो बाघ की खाल धारण (वस्त्र के रूप में) करता है। वह त्रिलोचन (तीन आँखों वाले ) शिव शंकर है।

तपः स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दमः
क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वं हीरकार्यनिवर्तनम् !!

अपने धर्म ( कर्त्तव्य ) में लगे रहना ही

तपस्या है। मन को वश में रखना ही दमन है। सुख-दुःख, लाभ-हानि में एकसमान भाव रखना ही क्षमा है। न करने योग्य कार्य को त्याग देना ही लज्जा है!

वायूनां शोधकाः वृक्षाः रोगाणामपहारकाः
तस्माद् रोपणमेतेषां रक्षणं च हितावहम् !!

वृक्ष वायु को शुद्ध करते हैंऔर रोगों को दूर भगाने में सहयोगी होते हैं, इसलिए वृक्षों का रोपण और रक्षण प्राणीमात्र के लिए हितकारी है! 

क्षणे तुष्टं क्षणे रुष्टं, तुष्टं रुष्टं क्षणे-क्षणे
इदृशानां जनानाम् तु प्रसादो अपि भयंकरः !!

जो लोग पल में तुष्ट (संतुष्ठ) और पल में रुष्ट (दुखी, गुस्सा ) होते हैं। बार बार तुष्ट रुष्ट होते हैं। ऐसे लोग बहुत खतरनाक होते हैं ये भरोसे के लायक नहीं होते हैं! 

न हि कश्चित विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति
अतः श्वः करणीयानी कुर्यादद्यैव बुद्धिमान !!

भविष्य का किसी को पता नहीं,

कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है। इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान है!

यच्छक्यं ग्रसितुं शस्तं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्
हितं च परिणामे यत्तदाद्यं भूतिमिच्छता !!

जो वस्तु खाने योग्य है और खाने पर आसानी से पच जाए और इसका पाचन शरीर के लिए हितकारी हो ऐश्वर्य की इच्छा करने वाले व्यक्ति को ऐसी वस्तु का ही सेवन करना चाहिए!  

वाणी रसवती यस्य, यस्य श्रमवती क्रिया
लक्ष्मी : दानवती यस्य, सफलं तस्य जीवितं !!

जिस मनुष्य की वाणी (बोली) मीठी है, जिसका कार्य परिश्रम (मेहनत) से युक्त है, जिसका धन, दान करने में प्रयुक्त होता है, उसका जीवन ही सफल है!

प्रतिदिन पढ़े जाने वाले संस्कृत श्लोक – Daily sanskrit shlokas

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात !!

हम उस पूजनीय, ज्ञान का भंडार

ईश्वर का ध्यान करते हैं, जिसने इस

संसार को उत्पन्न किया है। जो हमें

पापों और अज्ञानता से दूर रखता है।

वह ईश्वर हमें हमें सत्य का मार्ग दिखाए

और इस मार्ग पर चलने का आशिर्वाद दे!

आदि देव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर:
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते !!

हे आदिदेव सूर्य (भास्कर)

आपको मेरा प्रणाम, हे दिवाकर

आप मुझ पर प्रसन्न हो, हे दिवाकर

आपको मेरा नमस्कार है,

हे प्रभाकर आपको मेरा नमस्कार है!

देवो रुष्टे गुरुस्त्राता गुरो रुष्टे न कश्चन:
गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता न संशयः !!

यदि भाग्य ख़राब हो या रुठ जाए तो गुरु सदैव रक्षा करते हैं। यदि गुरु रुठ जाए तो कोई रक्षा नहीं करता। इसलिए इसमें कोई

संदेह नहीं है की गुरु ही सच्चा रक्षक है, गुरु ही रक्षक है, गुरु ही रक्षक है!

प्रातःस्नानं चरित्वाथ शुद्धे तीर्थे विशेषतः।
प्रातःस्नानाद्यतः शुद्ध्येत् कायो अयं मलिनः सदा।।
नोपसर्पन्ति वै दुष्टाः प्रातःस्नायिजनं क्वचित्।
दृष्टादृष्टफलं तस्मात् प्रातःस्नानं समाचरेत्।।

शुद्ध तीर्थ में सुबह ही स्नान करना चाहिए। यह मलपूर्ण शरीर शुद्ध तीर्थ में स्नान करने से शुद्ध होता है। प्रातः काल स्नान करने वाले के पास भूत प्रेत आदि दुष्ट नहीं आते। इस तरह दिखाई देने वाले फल जैसे शरीर की स्वच्छता और न् दिखाई देने वाले फल जैसे पाप नाश तथा पुण्य की प्राप्ति। ये दोनों प्रकार के फल प्रातः स्नान करने वाले को मिलते हैं।

कपिला कालिकेयो अनन्तो वासुकिस्तक्षकस्तथा।
पञ्चैतान् स्मरतो नित्यं व्याधिस्तस्य न जायते।।

कालिकेय, कपिला, शेषनाग और तक्षक, वासुकी इनका नित्य स्मरण करने वाले को सर्प और किसी भी तरह के विष का डर नहीं होता।

स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च।
गुरुवृत्यनुरोधेन न किञ्चिदपि दुर्लभम्।।

गुरुजनों की सेवा करने से व्यक्ति को स्वर्ग, धन-धान्य, विद्या, पुत्र और सुख कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये।
पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्द्धनम्।।

मूर्खों व्यक्ति को दिया गया उपदेश उनके गुस्से को शांत न करके और बढ़ाता ही है। जैसे सर्पों को दूध पिलाने से उनका विष कम नहीं बल्कि बढ़ता ही है।

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥ 

बगैर बुलाये ही किसी भी जगह पर चले जाना और बगैर कुछ पूछें बोलना, जिन पर  यकीन नहीं किया जा सकता, ऐसे व्यक्तियों  पर यकीन करना यह सभी मूर्ख और बुरे लोगों की पहचान हैं। 

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।।

कोई भी काम खूब मेहनत करनें से ही पूरा होता है, उस काम को केवल सोचनें या इच्छा करनें से वह काम पूर्ण नही होता है, जिस तरह एक सोते हुए सिंह के मुंह में हिरण खुद नहीं आता, उसके लिए सिंह को खुद मेहनत करना पड़ता है। 

धर्म पर संस्कृत श्लोक एवं हिंदी अर्थ – Sanskrit Shlokas on Relegions

अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद् गजभूषणं।
चातुर्यम् भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणं।। 

किसी भी काम को जोश में आ कर या बगैर सोचे समझे नहीं करना चाहिए, क्योंकि विवेक का शून्य होना विपत्तियों को बुलावा देने के बराबर है। जबकि जो लोग सोंच-समझकर काम करता है, ऐसे लोगों को माँ लक्ष्मी स्वयं ही उसका चयन कर लेती है।

कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति ।
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् ॥ 

जब तक किसी व्यक्ति का काम पूर्ण नहीं होता है तब तक वह दूसरों की तारीफ करते हैं और जैसे ही काम पूर्ण हो जाता है, व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं। यह ठीक उसी प्रकार होता है जैसे-नदी पार करने के बाद नाव का कोई इस्तेमाल नहीं रह जाता है। कहनें का आशय यह है कि अपना स्वार्थ सिद्ध हो जानें पर उस व्यक्ति को भूल जाते है। 

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।। 

ऐसे माता-पिता या अभिभावक जो अपन बच्चों को नहीं पढ़ाते है अर्थात शिक्षा अध्ययन के लिए नहीं भेजते है वह अपनें बच्चों के लिए एक शत्रु के समान है। जिस प्रकार विद्वान व्यक्तियों की सभा में एक निरक्षर व्यक्ति को कभी सम्मान नहीं मिल सकता वह हंसो के बीच एक बगुले की तरह होता है।

यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।

जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं ऐसा तुम मान लो।

स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥

इस श्लोक का अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति का जो मूल स्वभाव होता है, वह कभी नही बदलता है, चाहे आप उसे कितना भी समझाएं और किनती भी सलाह दे | यह ठीक उसी प्रकार से होता है जैसे पानी को आग में उबालनें पर वह गर्म हो जाता है और खौलनें लगता है परन्तु कुछ समय पश्चात वह अपनी पुरानी अवस्था में आ जाता है। 

अष्टौ गुणा पुरुषं दीपयंति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च।
पराक्रमश्चबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥

आठ गुण मनुष्य को सुशोभित करते है – बुद्धि, अच्छा चरित्र, आत्म-संयम, शास्त्रों का अध्ययन, वीरता, कम बोलना, क्षमता और कृतज्ञता के अनुसार दान।

यमसमो बन्धु: कृत्वा यं नावसीदति।

मनुष्य के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उनका सबसे बड़ा शत्रु होता है, परिश्रम जैसा दूसरा कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता है।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।

न मातु: परदैवतम्।

मां से बढ़कर कोई देव नहीं है।

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।

धर्म है क्या? धर्म है दूसरों की भलाई। यही पुण्य है। और अधर्म क्या है? यह है दूसरों को पीड़ा पहुंचाना। यही पाप है।

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।

कहते हैं कि कुल की भलाई के लिए की किसी एक को छोड़ना पड़े तो उसे छोड़ देना चाहिए। गांव की भलाई के लिए यदि किसी एक परिवार का नुकसान हो रहा हो तो उसे सह लेना चाहिए। जनपद के ऊपर आफत आ जाए और वह किसी एक गांव के नुकसान से टल सकती हो तो उसे भी झेल लेना चाहिए। पर अगर खतरा अपने ऊपर आ पड़े तो सारी दुनिया छोड़ देनी चाहिए।

यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।
न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः ॥

विवेकशील और बुद्धिमान व्यक्ति सदैव ये चेष्ठा करते हैं की वे यथाशक्ति कार्य करें और वे वैसा करते भी हैं तथा किसी वस्तु को तुच्छ समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं। 

एकः क्षमावतां दोषो द्वतीयो नोपपद्यते। 
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥

क्षमाशील व्यक्तियों में क्षमा करने का गुण होता है, लेकिन कुछ लोग इसे उसके अवगुण की तरह देखते हैं । यह अनुचित है।

न्यायार्जितस्य द्रव्यस्य बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ । 
अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चाप्रतिपादनम् ॥

न्याय और मेहनत से कमाए धन के ये दो दुरूपयोग कहे गए हैं- एक, कुपात्र को दान देना और दूसरा, सुपात्र को जरूरत पड़ने पर भी दान न देना। 

न योऽभ्यसुयत्यनुकम्पते च न दुर्बलः प्रातिभाव्यं करोति ।
नात्याह किञ्चित् क्षमते विवादं सर्वत्र तादृग् लभते प्रशांसाम् ॥

जो व्यक्ति किसी की बुराई नही करता ,सब पर दया करता है ,दुर्बल का भी विरोध नही करता ,बढ-चढकर नही बोलता ,विवाद को सह लेता है ,वह संसार मे कीर्ति पाता है।

देशाचारान् समयाञ्चातिधर्मान् बुभूषते यः स परावरज्ञः । 
स यत्र तत्राभिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति ॥

जो व्यक्ति लोक -व्यवहार ,लोकाचार ,समाज मे व्याप्त जातियों और उनके धर्मों को जान लेता है उसे ऊँच-नीच का ज्ञान हो जाता है। वह जहाँ भी जाता है अपने प्रभाव से प्रजा पर अधिकार कर लेता है। 

न चातिगुणवत्स्वेषा नान्यन्तं निर्गुणेषु च। 
नेषा गुणान् कामयते नैर्गुण्यात्रानुरज़्यते। 
उन्मत्ता गौरिवान्धा श्री क्वचिदेवावतिष्ठते॥

लक्ष्मी न तो प्रचंड ज्ञानियों के पास रहती है, न नितांत मूर्खो के पास। न तो इन्हें ज्ञानयों से लगाव है न मूर्खो से। जैसे बिगड़ैल गाय को कोई-कोई ही वश में कर पाता है, वैसे ही लक्ष्मी भी कहीं-कहीं ही ठहरती हैं।

दानं होमं दैवतं मङ्गलानि प्रायश्चित्तान् विविधान् लोकवादान् । 
एतानि यः कुरुत नैत्यकानि तस्योत्थानं देवता राधयन्ति ॥

जो व्यक्ति दान, यज्ञ, देव -स्तुति, मांगलिक कर्म, प्रायश्चित तथा अन्य सांसरिक कार्यों को यथाशक्ति नियमपूर्वक करता है ,देवी-देवता स्वयं उसकी उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

न संरम्भेणारभते त्रिवर्गमाकारितः शंसति तत्त्वमेव ।
न मित्रार्थरोचयते विवादं नापुजितः कुप्यति चाप्यमूढः ॥

जो जल्दबाजी में धर्म ,अर्थ तथा काम का प्रारंभ नहीं करता ,पूछने पर सत्य ही उद् घाटित करता है, मित्र के कहने पर विवाद से बचता है ,अनादर होने पर भी दुःखी नहीं होता। वही सच्चा ज्ञानवान व्यक्ति है। 

वीरता पर संस्कृत श्लोक एवं हिंदी अर्थ – Heroism Sanskrit Shlokas

सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चित् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम् ।
न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः ॥

जो किसी कमजोर का अपमान नहीं करता, हमेशा सावधान रहकर बुद्धि-विवेक द्वारा शत्रुओं से निबटता है, बलवानों के साथ जबरन नहीं भिड़ता तथा उचित समय पर शौर्य दिखाता है, वही सच्चा वीर है। 

शाश्वतम्, प्रकृति-मानव-सङ्गतम्,
सङ्गतं खलु शाश्वतम्।
तत्त्व-सर्वं धारकं
सत्त्व-पालन-कारकं
वारि-वायु-व्योम-वह्नि-ज्या-गतम्।
शाश्वतम्, प्रकृति-मानव-सङ्गतम्।।(ध्रुवम्)

प्रकृति और मनुष्य के बीच का संबंध शाश्वत है। रिश्ता शाश्वत है। जल, वायु, आकाश के सभी तत्व, अग्नि और पृथ्वी वास्तव में धारक हैं और जीवों के पालनहार।

आपोऽनिर्मारुतश्चैव नित्यं जाग्रा
मूलमेते शरीरस्य व्यान प्राणानिह स्थिताः।।

महाभारतके शांतिपर्व में भी कहा गया है कि, प्राणियों के शरीर इन पाँच महाभूतों के मिलने से बनते हैं। श या गति वाय के कारण है। खोखलेपन आकाश का अंश शरीर की गर्मी अग्नि का भाग और रक्त आदि तरल पदार्थ जल के अंश हैं। हड्डी, मांस, आदि कड़े पदार्थ पृथिवी के अंश हैं। 

श्रोतं घ्राणं रसः स्पर्शी दृष्टिश्चेन्दियसंज्ञिताः।।

आकाशादि पंचमहाभूत के रजस अंश से अलग-अलग व्यष्टिरूप में क्रमशः वाणी, हाथ, पैर, गुदा और जननेन्द्रिय – ये पांच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुई।

तेजो ह्यग्निस्तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा यथैव च।
अग्निर्जरयते यश्च पश्चाग्नेयाः शरीरिणः।।

कान, नाक, मुख, हृदय और पेट ये आकाश के तत्त्व हैं। 

कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्याणि।।

आकाशादि पंचमहाभूत के उसी रजस अंश से समष्टिरुप में क्रमशः प्राण, अपान , व्यान , उदान और समान पांच प्राणवायु उत्पन्न हुए। 

आकाशे तारकान् पश्य ।

ऊपर दिए गए श्लोक का अर्थ होता है आकाश में तारे देख। 

मृत्तोयैः शुद्ध्यते शोध्यं नदी वेगेन शुद्ध्यति ।
रजसा स्त्री मनोदुष्टा सन्न्यासेन द्विजोत्तम: 

पदार्थगत भौतिक अस्वच्छता स्वच्छ मिट्टी एवं जल के प्रयोग से दूर होती है और नदी अपने प्रवाह से ही शुद्ध हो जाती है। मन में कुविचार रखने वाली स्त्री की शुद्धि रजस्राव में निहित रहती है तो ब्राह्मण की शुद्धि संन्यास में निहित रहती है। 

अद्भिर्गात्राणि शुद्ध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्ध्यति 

शरीर की शुद्धि जल से होती है। मन की शुद्धि सत्य भाषण से होती है। जीवात्मा की शुचिता के मार्ग विद्या और तप हैं। और बुद्धि की स्वच्छता ज्ञानार्जन से होती है। 

सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः 

सभी शौचों, शुचिताओं, यानी शुद्धियों में धन से संबद्ध शुचिता ही वास्तविक शुद्धि है। मात्र मृदा-जल (मिट्टी एवं पानी) के माध्यम से शुद्धि प्राप्त कर लेने से कोई वास्तविक अर्थ में शुद्ध नहीं हो जाता। 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। कर्म के फल का अधिकार तेरे पास नहीं है। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और न ही कर्म न करने के भाव मन में ला। अतः कर्म कर फल की चिंता मत कर।

यस्मिन् देशे वयं जन्मधारणं कुर्मः स हि अस्माकं देशः जन्मभूमिः वा भवति । 
जननी इव जन्मभूमिः पूज्या आदरणीया च भवति । 
अस्याः यशः सर्वेषां देशवसिनां यशः भवति । 
अस्याः गौरवेण एव देशवसिनां गौरवम् भवति ।

अर्थ: जिस देश में हम जन्म लेते हैं वही हमारा देश या जन्म स्थान होता है। एक माँ की तरह, मातृभूमि की पूजा और सम्मान करना चाहिए। उसकी कीर्ति देश के समस्त निवासियों की कीर्ति है। यह उनकी गरिमा से है कि देश के निवासियों को गर्व है।

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FAQ’S Related To Sanskrit ke Shlok

Q1. घमंड से जुड़े संस्कृत के श्लोक क्या है? 

मानं हित्वा प्रियो भवति। क्रोधं हित्वा न सोचति।।
कामं हित्वा अर्थवान् भवति। लोभं हित्वा सुखी भवेत्।।

Q2. देशभक्ति पर संस्कृत श्लोक कौन सा है?

यस्मिन् देशे वयं जन्मधारणं कुर्मः स हि अस्माकं देशः जन्मभूमिः वा भवति,
जननी इव जन्मभूमिः पूज्या आदरणीया च भवति।
अस्याः यशः सर्वेषां देशवसिनां यशः भवति,
अस्याः गौरवेण एव देशवसिनां गौरवम् भवति।।

Q3. शौर्य पर संस्कृत श्लोक कौन सा है?

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

Q4. श्लोक का शाब्दिक अर्थ क्या है?

श्लोक का शाब्दिक अर्थ ध्वनि, आवाज, शब्द इत्यादि है।

Sanskrit Shlok हिंदी अर्थ सहित [VIDEO]

निष्कर्ष- 

आशा करता हूं कि आपको हमारा आज का संस्कृत श्लोक अर्थ सहित (Sanskrit Shlokas With Meaning in Hindi) का यह पोस्ट पसंद आया होगा। आज के लेख में मैंने आपको Sanskrit ke shlok के साथ जानकारी प्रदान किया है। इसके साथ ही अगर आपको इस पोस्ट को पढ़कर कोई सवाल पूछना हो, तो आप कमेंट करके पूछ सकते हैं। 

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Author: Amresh Mishra
I am Amresh Mishra, owner of My Technical Hindi Website. I am a B.Sc graduate degree holder and 21yrs old young entrepreneur from the City of Patna. By profession, I'm a web designer, computer teacher, google webmaster and SEO optimizer. I have deep knowledge of Google AdSense and I am interested in Blogging.

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